घोसी लोकसभा चुनाव: क्या फिर से भूमिहार या राजभर करेंगे राज?

आम चुनाव का बिगुल बज चुका है। सभी दल चुनावी तैयारी में जुट गए हैं। घोसी लोकसभा सीट पर मतदान आखिरी चरण में होगा। वोटिंग इस सीट पर अंतिम है, लेकिन अबकी बार इस पर दावेदारी की चर्चा दिल्ली तक में है।

सुभासपा के डॉ. अरविंद राजभर, यहाँ से एनडीए के प्रत्याशी हैं, जो उत्तर प्रदेश के चर्चित नेता और मंत्री ओमप्रकाश राजभर के पुत्र हैं। अबकी बार भाजपा से कई नेताओं की चर्चा थी। जिसमें पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं, मंत्रियों सहित पश्चिम बंगाल प्रभारी युवा नेता शक्ति सिंह भी शामिल थे। इन्होंने भी अपना कैंपेन मोदी सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच बताने के लिए चलाया।

घोसी लोकसभा चुनाव: किस राजनीतिक नेता की होगी बाजी

चर्चा में उत्तर प्रदेश सरकार के नए बने कारागार मंत्री दारा सिंह चौहान, कद्दावर मंत्री ए. के. राय शर्मा का भी नाम था। मगर, भाजपा ने ये सीट अपने सहयोगी सुभासपा को दे दी। जिसके बाद देखने, सुनने में यह आ रहा है कि एनडीए ने ये सीट सुभासपा को देकर अपने पार्टी के तमाम नेताओं सहित कार्यकर्ताओं तक को निराश कर दिया है।

कई राजनीतिक समीक्षक इसे गठबंधन की मजबूरी बता रहे हैं तो कुछ इसे समझदारी बता रहे हैं। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में इस सीट पर मंथन नहीं हुआ होगा। जरूर हुआ होगा। ध्यान से देखने पर काफी सोचा-समझा निर्णय ये प्रतीत होता दिख रहा है। केंद्रीय नेतृत्व को ये भी पता है कि हर चुनाव के पहले हर दल में असंतोष कुछ दिनों तक दिखता है। कुछ नाराजगी दिखती है। हर दल में गुटबाजी चलती है। जिसे पार्टी के प्रभावी नेता वोटिंग तक अपने प्रयास से ठीक कर लेते हैं।

वास्तव में, पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने यहाँ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 122,568 वोटों से हराया था। यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि बसपा के उम्मीदवार नए थे और उन्हें अपने काम का ब्यौरा भी नहीं था। फिर भी, केवल जातिवादी गणित के आधार पर उन्होंने चुनाव जीत लिया। समाजवादी पार्टी (सपा) से गठबंधन के फलस्वरूप बसपा को बड़ा फायदा मिला। बसपा के उम्मीदवार अतुल सिंह (राय) ने बसपा को कुल वोटों का १.५ प्रतिशत वोट अकेले प्राप्त किया। जबकि भाजपा को ४१.५ प्रतिशत वोट मिला। इससे उसे दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा।

अब, २०१४ के लोकसभा चुनाव पर ध्यान देते हैं। इस चुनाव में भाजपा ने ३६.५२ प्रतिशत वोट हासिल किया था और बसपा के उम्मीदवार दारा सिंह चौहान को १,४६,०१५ वोटों से हराया था। इस चुनाव में मोदी फैक्टर के साथ साथ सपा और बसपा का अलग-अलग चुनाव लड़ना भी महत्वपूर्ण था। भाजपा ने इस से अपने वोटों में जबरदस्त वृद्धि की थी, जिससे उसके “अबकी बार, मोदी सरकार” का नारा लोगों को प्रभावित किया। २००९ के चुनाव में, भाजपा को केवल १२.४५ प्रतिशत वोट मिले थे।

इस परिस्थिति में, भाजपा ने सुभासपा के प्रति अपनी चालबाजी को समझ कर चला है। उनमें से एक हैं ओमप्रकाश राजभर, जो हमेशा से दलितों और पिछड़ों को राजनीतिक सहभागिता दिलाने का प्रयास करते रहे हैं। उन्हें अब यह साबित करना होगा कि यह समुदाय भी उनके साथ है। उनके पूर्व में सहयोगी महेंद्र राजभर अब सपा के साथ पीडीए का हिस्सा हैं। ओमप्रकाश राजभर दबाव की राजनीति खूब जानते हैं। वे कभी भी किसी का साथ छोड़ सकते हैं। उनकी इस क्षमता को सभी दलों ने समझा है।

भाजपा, 400 पार के नारे के साथ चुनाव लड़ रही है। उसे लगता है कि जातीय समीकरण और मोदी, योगी फैक्टर उसे 2014 जैसी जीत दिला सकते हैं। सपा, बसपा, अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। इनके परंपरागत वोटर अगर उन्हें वोट करेंगे, तो उन्हें चुनाव जीतने में आसानी होगी। अगर इनके वोट बैंक से कुछ प्रतिशत भी उन्हें मिलें, तो उनके अपने वोटबैंक के साथ जीतने की संभावना और भी बढ़ जाएगी।

अब, सपा ने राजीव राय को एक बार फिर टिकट दिया है, जिससे उसकी रणनीति को चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। उसके लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि राजीव राय घोसी और सपा के लिए पुराने हैं, इसलिए उन पर बाहरी या दलबदलू होने का आरोप भी नहीं लगेगा। हाल ही में, घोसी विधानसभा चुनाव में भी एक चुनावी मुद्दा बना था कि विधानसभा में पहुंचने के बाद मंत्री बने नेताजी के लिए दल को बदलना पड़ा था। सपा की ओर से माना जा रहा है कि उनके ‘एमवाई’ समीकरण के साथ अग्रिम जातियों के वोट भी मिल सकते हैं, जिससे उनकी जीत की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

सपा फिलहाल जहां लड़ाई में दिख रही है, वहीं अभी तक बसपा ने अपने प्रत्याशी का ऐलान नहीं किया है। मऊ नगर पालिका चेयरमैन अरशद जमाल का नाम चर्चा में है, लेकिन यह बात अभी तक निर्धारित नहीं है। फिर भी, यदि यह चुनाव लड़ा जाता है, तो यहां की चुनावी टक्कर बहुत ही रोमांचक हो सकती है। यहां दलितों और मुस्लिमों के वोट सबसे अधिक हैं, इसलिए चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

अब, इस बार घोसी सीट पर सर्वाधिक बार जीत का रिकॉर्ड बनाने वाली भूमिहार जाति की जीत होगी या नहीं, यह बाद में पता चलेगा। लेकिन जीत के लिए, वह अपने बिरादरी के साथ अन्य जातियों को भी अपनी ओर खींचने का प्रयास करेगा। इसे साकार करने के लिए, राजभर भी उन जातियों को भरोसा दिलाने की कोशिश करेंगे। इस तरह की रणनीति को अंजाम देने के लिए, दलों को अपने संगठन को मजबूत करने और अपने वोटरों को बूथ तक

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